इतिहास के पन्नों से: प्रतापगढ़ रियासत के गौरवशाली 'अचलावाड़ा ठिकाने' की शौर्य गाथा
विशेष ब्यूरो, राजस्थान
प्रतापगढ़/राजस्थान।। राजस्थान की वीर धरा का इतिहास केवल बड़ी रियासतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर समाए छोटे-छोटे ठिकाने और जागीरें भी वीरता और रणनीतिक कौशल की अद्भुत मिसाल रहे हैं। ऐसा ही एक स्वर्णिम इतिहास समेटे हुए है—अचलावाड़ा ठिकाना, जो कभी ब्रिटिश भारत की राजपूताना एजेंसी के अंतर्गत आने वाली 'प्रतापगढ़ रियासत' (पारतबगढ़) की एक प्रथम श्रेणी की जागीर हुआ करता था।
मेवड़, मालवा और गुजरात के भौगोलिक संगम पर स्थित यह ठिकाना न केवल सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था, बल्कि सिसोदिया राजपूत वंश की कुल-मर्यादा का एक जीवंत प्रतीक भी रहा है।
मेवाड़ के गौरवशाली 'सिसोदिया वंश' से जुड़ाव
अचलावाड़ा ठिकाने के इतिहास को समझने के लिए इसके मूल वंश को जानना जरूरी है। यह ठिकाना सूर्यवंशी क्षत्रियों की प्रतिष्ठित 'सिसोदिया' शाखा से संबंधित है, जिन्होंने मेवाड़ पर ८०० से अधिक वर्षों तक शासन किया। राणा हमीर, राणा कुम्भा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों के इसी वंश की एक शाखा ने आगे चलकर प्रतापगढ़ रियासत की नींव रखी थी।
इतिहास के अनुसार, मेवाड़ के महाराणा कुम्भा और उनके छोटे भाई क्षेमकर्ण के बीच हुए एक विवाद के बाद, क्षेमकर्ण के परिवार ने अरावली की दक्षिणी पहाड़ियों में शरण ली। इसके बाद सन १४२५ में कांथल राज्य की स्थापना हुई। इसी क्रम में, १५१४ में राजकुमार सूरजमल देवगढ़ के शासक बने और आगे चलकर उनके वंशज राजकुमार प्रताप सिंह ने १६९८ में 'प्रतापगढ़' नगर की स्थापना की, जो इस रियासत की राजधानी बना।
कैसे अस्तित्व में आया अचलावाड़ा ठिकाना?
राजपूत परंपरा के अनुसार, ज्येष्ठ पुत्र को राज्य की गद्दी सौंपी जाती थी और कनिष्ठ (छोटे) पुत्रों को सीमावर्ती क्षेत्रों की रक्षा और भरण-पोषण के लिए जागीर या ठिकाना दिया जाता था। इसी दूरदर्शी व्यवस्था के तहत, प्रतापगढ़ के १०वें महारावत हरि सिंह के कनिष्ठ पुत्र महाराज माधव सिंह (मधो सिंह) को अचलावाड़ा की ठिकानेदारी प्रदान की गई।
महाराज माधव सिंह की माता महारानी अजबकुँवरि गौर थीं, जिन्होंने बाद में सती होकर अपने पातिव्रत्य और वंश की गरिमा को इतिहास में अमर कर दिया।
सामरिक चौकी और मराठा आक्रमणों से रक्षा
अचलावाड़ा महज एक जागीर नहीं, बल्कि प्रतापगढ़ रियासत की एक मजबूत सैन्य चौकी थी। मालवा के पठार और मेवाड़ की पहाड़ियों के बीच स्थित होने के कारण यह क्षेत्र बाहरी आक्रांताओं के निशाने पर रहता था।
अचलावाड़ा के ठाकुरों को प्रथम श्रेणी के सामंत का दर्जा प्राप्त था। उनका मुख्य दायित्व मालवा की ओर से होने वाले मराठा आक्रमणों को रोकना और पड़ोसी रियासतों के दबाव से अपने राज्य की रक्षा करना था। इन सामंतों ने हर मोर्चे पर अपनी तलवार और बुद्धिमत्ता के दम पर सिसोदिया कुल की आन-बान और शान को अक्षुण्ण रखा।
आज भी जीवंत है विरासत
अचलावाड़ा ठिकाने का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि कैसे मुख्य रियासतों के साये में रहकर भी इन जागीरों ने अपनी स्वतंत्र पहचान और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखा। आज भले ही राजशाही का दौर बीत चुका हो, लेकिन अचलावाड़ा और प्रतापगढ़ का यह साझा इतिहास आज भी राजस्थान के गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है।

