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Dhad हाथों में तीर-कमान, पुरुषों का वेश; इंद्रदेव को रिझाने के लिए महिलाओं ने निकाली अनोखी 'धाड़'

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इंद्रदेव को रिझाने के लिए महिलाओं ने धारण किया पुरुषों का वेश: टामटिया गांव में अनूठी 'धाड़' परंपरा से अच्छी बारिश की कामना

बांसवाड़ा/राजस्थान आधुनिकता के इस दौर में आज भी ग्रामीण अंचलों में लोक आस्था और पारंपरिक मान्यताएं पूरी शिद्दत के साथ जीवित हैं। कुछ ऐसा ही अनोखा नजारा आनंदपुरी उपखंड क्षेत्र के टामटिया गांव में देखने को मिला, जहां क्षेत्र में अच्छी बारिश (सुकाल) की कामना को लेकर महिलाओं ने सदियों पुरानी 'धाड़' परंपरा का निर्वहन किया। इंद्रदेव को रिझाने के लिए आयोजित इस अनूठे आयोजन में पूरा गांव लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया।

राजस्थान के बांसवाड़ा (Banswara) जिले में अच्छी बारिश और अच्छी फसल की कामना के लिए 'धाड़' नामक एक अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती हैइसमें महिलाएं पुरुषों के वेश में, हाथों में तलवारें और लट्ठ लेकर पैदल मार्च निकालती हैं और इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए गेर नृत्य करती हैं

पुरुषों के वेश में निकलीं महिलाएं, हाथों में चमके पारंपरिक हथियार

इस पारंपरिक अनुष्ठान की सबसे खास बात यह रही कि महिलाओं ने पूरी तरह से पुरुषों का रूप धारण किया। बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाओं ने सफेद वस्त्र (पारंपरिक पुरुष पहनावा) पहने और हाथों में तीर-कमान, लाठियां व अन्य पारंपरिक हथियार लेकर 'धाड़' निकाली। पुरुषों के वेश में शस्त्रों के साथ मार्च करतीं इन महिलाओं का उत्साह देखते ही बनता था।

माला देवी मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ शुरुआत

इस धाड़ यात्रा की शुरुआत टामटिया गांव से हुई। सभी एकत्रित महिलाओं ने सबसे पहले प्रसिद्ध माला देवी मंदिर में पहुंचकर शीश नवाया। यहां विधि-विधान से विशेष पूजा-अर्चना की गई और माता रानी व इंद्रदेव से क्षेत्र में खुशहाली तथा झमाझम बारिश की प्रार्थना की गई, ताकि किसानों के खेतों में हरियाली लौट सके।

पैदल छाजा गांव पहुंचीं, लोकगीतों और नृत्य से बांधा समां

मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद महिलाओं का यह कारवां आदिवासी लोकगीत गाते हुए पैदल ही पड़ोसी गांव छाजा के लिए रवाना हुआ। रास्ते भर महिलाएं पारंपरिक गीतों के जरिए इंद्रदेव का आह्वान करती रहीं।

जब यह अनूठी यात्रा छाजा गांव पहुंची, तो वहां के मुख्य चौराहे पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से पारंपरिक लोकनृत्य प्रस्तुत किया। ढोल की थाप और पारंपरिक गीतों पर महिलाओं के कदम थिरक उठे, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्रित हो गए।

क्या है 'धाड़' की मान्यता? वागड़ अंचल के आदिवासी समाज में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि जब मानसून में देरी होती है या सूखा पड़ने के आसार होते हैं, तो महिलाएं पुरुषों का वेश धारण कर 'धाड़' निकालती हैं। माना जाता है कि महिलाओं के इस रूप और कठिन अनुष्ठान से प्रसन्न होकर वर्षा के देवता इंद्रदेव अपनी कृपा बरसाते हैं और क्षेत्र में अकाल का साया टल जाता है।

इस प्राचीन परंपरा से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
  • परंपरा का स्वरूप (धाड़): बांसवाड़ा के बागीदौरा, आनंदपुरी और अरथूना क्षेत्रों में विशेष रूप से यह आयोजन किया जाता है। इसमें सैकड़ों महिलाएं पारंपरिक सफेद धोती-कुर्ता और सिर पर पगड़ी पहनकर पुरुषों का रूप धारण करती हैं
  • पूजा और नृत्य: इस यात्रा के दौरान महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाती हैं और गेर नृत्य करती हैं。तलवार और लट्ठ लहराते हुए वे करीब 10 से 15 किलोमीटर तक पैदल चलती हैं
  • मान्यता: स्थानीय लोक-विश्वास के अनुसार, ऐसा करने से इंद्र देव प्रसन्न होते हैं। जब बारिश नहीं होती या सूखा पड़ने की आशंका होती है, तब इंद्र देव को रिझाने और क्षेत्र में अच्छी वर्षा व सुख-समृद्धि लाने के लिए यह आयोजन किया जाता है

इस अनूठे आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों, संस्कृति और लोक मान्यताओं के प्रति ग्रामीणों का विश्वास कितना अटूट है।

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