भील प्रदेश की मांग: आदिवासी बहुल अंचल में सियासत तेज, विभिन्न संगठनों का समर्थन और नेताओं के बयान
राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग 'भील प्रदेश' (Bhil Pradesh) राज्य बनाने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है।
भारत आदिवासी पार्टी (BAP):
बांसवाड़ा-डूंगरपुर से सांसद राजकुमार रोत और BAP के विधायक (जैसे उमेश मीणा, थावरचंद मीणा, कमलेश डोडियार) इस समय 'भील प्रदेश' की मांग के सबसे बड़े ध्वजवाहक बने हुए हैं।
रोत का तर्क: स्वतंत्रता के दशकों बाद भी चार राज्यों (राजस्थान, गुजरात, MP, महाराष्ट्र) के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों को बुनियादी सुविधाएं, रोजगार और विकास अधिकार नहीं मिले हैं। संविधान के अनुच्छेद 3 और 5वीं अनुसूची के तहत एक अलग राज्य का निर्माण पूर्णतः संवैधानिक अधिकार है।
भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) और बामसेफ (BAMCEF):
BTP इस मांग को शुरू से अपने चुनावी और सामाजिक एजेंडे का हिस्सा मानती रही है।
बामसेफ
और क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ जैसे सामाजिक संगठनों का मानना है कि 'मूलनिवासी अवधारणा' के तहत यह मांग क्षेत्र के बहुजन, सर्व-समाज, ओबीसी, दलित, मुस्लिम और ईसाई समुदायों के अधिकारों की रक्षा करती है।
सर्व-समाज (राजपूत, मुस्लिम, क्रिश्चियन व अन्य जातियां) का समर्थन:
समर्थकों का कहना है कि नए राज्य के बनने से किसी एक जाति का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सीमा में रहने वाले हर नागरिक को प्रशासनिक सुविधा, नए रोजगार और क्षेत्रीय बजट का सीधा लाभ मिलेगा।
अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों और नेताओं का क्या कहना है?
भील प्रदेश की उठती मांग पर सत्ताधारी और प्रमुख विपक्षी दलों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है:
भारतीय जनता पार्टी (BJP) का रुख:
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं (जैसे पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़, सांसद मन्नालाल रावत और राज्य मंत्रियों) ने इस मांग का कड़ा विरोध किया है।
नेताओं के तर्क: भाजपा नेताओं का कहना है कि अलग राज्य या नए नक्शे की बात करना अखंडता और प्रशासनिक व्यवस्था के विपरीत है।
उनका आरोप है कि यह जनता को बांटने और "सस्ते राजनीतिक लाभ" के लिए उठाया गया कदम है। सरकार का मानना है कि क्षेत्र का विकास मौजूदा राज्यों की सीमाओं में रहकर योजनाओं के माध्यम से किया जा रहा है।
कांग्रेस (Congress) का रुख:
कांग्रेस के स्थानीय और राष्ट्रीय नेता इस मुद्दे पर सधा हुआ रुख अपनाते हैं।
कुछ नेता इसे क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा का नतीजा मानते हैं, तो वहीं बड़े स्तर पर राज्य के विभाजन को लेकर सतर्कता बरतते हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन और PESA कानून के अधिकार देना प्राथमिक होना चाहिए।
'भील प्रदेश' की मांग ने पकड़ा जोर, BAP व सहयोगी संगठनों ने उठाई आवाज
राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के 39 से अधिक सीमावर्ती जिलों को मिलाकर पृथक 'भील प्रदेश' के निर्माण की मांग एक बार फिर सुलग उठी है। भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के सांसद राजकुमार रोत, BTP तथा बामसेफ और क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ जैसे संगठनों ने इस मांग को संवैधानिक अधिकार करार दिया है।
समर्थकों का कहना है कि यह मांग केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र के किसान, सर्व-समाज, राजपूत, मुस्लिम, ईसाई और ओबीसी वर्ग के बेहतर भविष्य और विकास के लिए है।
अलग राज्य बनने से क्षेत्रीय बजट, स्थानीय रोजगार और प्रशासनिक पहुंच सुलभ होगी। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसे राजनीतिक स्टंट बताते हुए खारिज किया है और राष्ट्रीय व प्रांतीय एकता को प्राथमिकता देने की बात कही है।
जैसे-जैसे इस मुद्दे पर जनसभाएं और यात्राएं बढ़ रही हैं, राजस्थान और मध्य भारत की राजनीति में 'भील प्रदेश' का मुद्दा एक बड़ा निर्णायक विषय बनता जा रहा है।



