TSP में 1 लाख पद खाली और महात्मा गांधी स्कूलों में अंग्रेजी का ‘ड्रामा’

0
Translate News:

शिक्षा व्यवस्था का काला सच: एक तरफ TSP में 1 लाख पद खाली, दूसरी तरफ महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूलों का 'अंग्रजी छल'

बांसवाड़ा / डूंगरपुर / उदयपुर संभाग : राजस्थान की स्कूली शिक्षा व्यवस्था इस समय दोहरा संकट झेल रही है। एक तरफ जहां जनजाति उपयोजना क्षेत्र (TSP) में शिक्षकों के अभाव में स्कूल ताले लटकने की कगार पर हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार की महत्वाकांक्षी 'महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूल' (MGEMS) योजना महज एक दिखावा साबित हो रही है। धरातल पर न तो शिक्षकों को खुद ठीक से अंग्रेजी आती है और न ही शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को। नतीजतन, सालभर केवल खानापूर्ति हो रही है और आदिवासी व ग्रामीण बच्चों का भविष्य अंधकार में धकेला जा रहा है।

राजस्थान शिक्षा विभाग का बड़ा खुलासा: 1.03 लाख पद खाली, महात्मा गांधी स्कूलों में केवल खानापूर्ति!

कागजों में 5,791 स्कूल क्रमोन्नत, धरातल पर 1.03 लाख पद खाली

'News Today' की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि पिछले चार वर्षों में वाहवाही लूटने के लिए 5,791 सरकारी स्कूलों को क्रमोन्नत तो कर दिया गया, लेकिन पर्याप्त शिक्षक और संसाधन नहीं दिए गए। शिक्षा निदेशालय, बीकानेर के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 1,03,589 पद खाली पड़े हैं।

श्रेणी / पदरिक्त पदों की संख्या
वरिष्ठ अध्यापक (Senior Teacher)51,339
प्राध्यापक (Lecturer)14,944
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी7,474
कनिष्ठ सहायक (Junior Assistant)6,044
बेसिक व वरिष्ठ कंप्यूटर अनुदेशक4,659
शारीरिक शिक्षक (PTI)1,757
अध्यापक लेवल-1 व लेवल-22,694
प्रयोगशाला सहायक (Lab Assistant)1,423

प्रशासनिक ढांचा भी पूरी तरह चरमरा चुका है—उपनिदेशक के 18 में से केवल 8 और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के 67 में से मात्र 33 पदों पर अधिकारी तैनात हैं। 34 जिलों में DEO के पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा सितंबर 2025 से 5,048 व्याख्याताओं की उपप्रधानाचार्य पद पर पदोन्नति की फाइलें अटकी हुई हैं।

महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल: अंग्रेजी का 'ड्रामा' और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़

TSP क्षेत्र की इस बदहाली के बीच महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का सच और भी भयावह है। वाहवाही बटोरने के लिए हिंदी माध्यम स्कूलों के रातों-रात बोर्ड बदलकर 'इंग्लिश मीडियम' तो लिख दिए गए, लेकिन अंदर की हकीकत बेहद चिंताजनक है:

  • शिक्षकों को खुद नहीं आती अंग्रेजी: इन स्कूलों में पदस्थापित अधिकांश शिक्षकों का खुद का बैकग्राउंड हिंदी माध्यम का है। आलम यह है कि खुद 'मास्टरों' के पल्ले कक्षा 7वीं और 8वीं का अंग्रेजी माध्यम का कोर्स नहीं पड़ रहा है।

  • सालभर में 2 पाठ भी पूरे नहीं: अंग्रेजी माध्यम के नाम पर सालभर सिर्फ खानापूर्ति होती है। कई महत्वपूर्ण विषयों में पूरे शैक्षणिक सत्र में 2 पाठ (Lessons) भी नहीं पढ़ाए जाते।

  • बच्चों को पढ़ना तक नहीं आता: जिन बच्चों को अंग्रेजी की बुनियादी समझ या रीडिंग तक नहीं आती, उन्हें जबरन अंग्रेजी किताबों के सामने बिठा दिया गया है। इससे बच्चों का बेसिक ज्ञान भी खत्म हो रहा है।

  • शिक्षकों और अभिभावकों की मांग: स्थानीय लोगों और खुद शिक्षकों का मानना है कि यदि अंग्रेजी पढ़ाने वाले योग्य शिक्षक उपलब्ध नहीं कराए जा सकते, तो इन स्कूलों को वापस हिंदी माध्यम कर दिया जाए। इसी में बच्चों और शिक्षकों दोनों की भलाई है।

आदिवासी बच्चों के साथ दोहरी मार कब तक?

TSP क्षेत्र का गरीब और आदिवासी बच्चा निजी स्कूलों की महंगी फीस नहीं भर सकता। वह पूरी तरह सरकारी तंत्र पर निर्भर है। एक तरफ तो 10-10 किलोमीटर दूर तक विषय अध्यापक नहीं हैं, जिससे कई बेटियों ने पढ़ाई छोड़ दी है, और दूसरी तरफ महात्मा गांधी स्कूलों के नाम पर अंग्रेजी का दिखावा करके बच्चों का हिंदी का आधार भी छीना जा रहा है।

प्राइम न्यूज की प्रमुख मांगें:

  1. रिक्त पदों पर तत्काल भर्ती: 1,03,589 रिक्त पदों को भरने के लिए टीएसपी क्षेत्र में विशेष भर्ती अभियान चलाया जाए।

  2. महात्मा गांधी स्कूलों का रिव्यू: जहां योग्य अंग्रेजी शिक्षक नहीं हैं, उन स्कूलों को तुरंत पुनः हिंदी माध्यम में बदला जाए या तुरंत प्रशिक्षित स्टाफ नियुक्त किया जाए।

  3. अटकी पदोन्नतियां बहाल हों: 5,048 व्याख्याताओं की DPC की फाइल को तुरंत क्लियर किया जाए।

  4. संसाधन और लैब व्यवस्था: क्रमोन्नत स्कूलों में लैब असिस्टेंट और कंप्यूटर अनुदेशकों की तुरंत तैनाती हो।

अगर सरकार ने समय रहते इन प्रशासनिक कमियों और खोखली योजनाओं पर ध्यान नहीं दिया, तो ये स्कूल केवल भूत बंगले और कागजी आंकड़े बनकर रह जाएंगे।

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)
Loading...
To Top