गुजरात की किताबों में गूंजा झाबुआ की 'Halma' का जयघोष

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गुजरात की पाठ्यपुस्तक में गूंजा झाबुआ की 'हलमा' का जयघोष, आदिवासी परंपरा को मिली राष्ट्रीय पहचान

झाबुआ/बांसवाड़ा : मध्यप्रदेश, राजस्थान और पूरे आदिवासी समाज के लिए यह एक अत्यंत ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण है। गुजरात सरकार ने अपने स्कूली पाठ्यक्रम में झाबुआ की विश्व प्रसिद्ध 'हलमा' परंपरा को शामिल किया है। अब गुजरात के लाखों विद्यार्थी अपनी पाठ्यपुस्तकों में भील समाज की इस अनूठी और निःस्वार्थ सेवा संस्कृति के बारे में पढ़ेंगे।

हलमा को राष्ट्रीय सम्मान: गुजरात की किताबों में झाबुआ का 'जल क्रांति' मॉडल

पाठ्यपुस्तक में झाबुआ का जीवंत चित्रण

गुजरात बोर्ड की नई पाठ्यपुस्तक में 'हलमा' को पर्यावरण और जल-संरक्षण के एक आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में झाबुआ में आयोजित हलमा के वास्तविक चित्रों के साथ विस्तार से बताया गया है कि कैसे इस परंपरा के ज़रिए:

  • पहाड़ियों पर हजारों खंतियां (CCT) खोदकर जल-संरक्षण किया गया।

  • लाखों पौधे लगाकर उजड़ी हुई धरा को पुन: हरा-भरा बनाया गया।

  • बिना किसी सरकारी बजट के पूरे समाज को एक सूत्र में जोड़ा गया।

क्या है 'हलमा'? भील समाज का अनमोल संस्कार

'हलमा' कोई सरकारी योजना नहीं, बल्कि भील आदिवासी समाज की सदियों पुरानी जीवनशैली का हिस्सा है। इसका सीधा सा अर्थ है—निःस्वार्थ सामूहिक सहयोग। जब भी किसी व्यक्ति, गांव या स्वयं प्रकृति पर कोई संकट आता है, तो पूरा समाज ढोल-मांदल की थाप पर एकजुट होकर बिना किसी मजदूरी या स्वार्थ के मदद के लिए आगे आता है।

पद्मश्री महेश शर्मा ने इसी परंपरा को पुनर्जीवित कर "धरती माता की हलमा" का रूप दिया। उनके आह्वान पर हजारों आदिवासी भाई-बहन हाथों में गैंती-फावड़ा लेकर पहाड़ियों पर उतर पड़े और जल-संरक्षण का एक ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसकी मिसाल आज पूरी दुनिया दे रही है।

ग्लोबल वार्मिंग के दौर में दुनिया के लिए सीख

आज जहां पूरी दुनिया पर्यावरण असंतुलन, जल-संकट और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए अरबों रुपये खर्च कर रही है, वहीं झाबुआ के आदिवासी समाज ने 'हलमा' के जरिए यह साबित कर दिया है कि प्रकृति की रक्षा जन-भागीदारी और प्राचीन परंपराओं से ही संभव है।

यह उपलब्धि दर्शाती है कि:

  1. टिकाऊ विकास का ज्ञान: आदिवासी संस्कृति में ही पर्यावरण को बचाने का वास्तविक विज्ञान छुपा है।

  2. युवाओं के लिए प्रेरणा: राजस्थान और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों (बांसवाड़ा, कुशलगढ़, झाबुआ, अलीराजपुर) के युवाओं के लिए अपनी जड़ों पर गर्व करने का यह बड़ा अवसर है।

  3. शिक्षा में सकारात्मक बदलाव: अब किताबों में केवल शहरी विकास ही नहीं, बल्कि ग्रामीण और जनजातीय संस्कृति की महान गाथाएं भी पढ़ाई जाएंगी।

गुजरात सरकार का यह कदम अत्यंत सराहनीय है। उम्मीद है कि मध्यप्रदेश और राजस्थान सरकार भी अपनी पाठ्यपुस्तकों में 'हलमा' जैसी पावन परंपराओं को स्थान देकर आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ेंगी।

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