Mysterious Architecture : 900 साल पुरानी पत्थर की मूर्ति में ब्रह्मांड नापते दिखे भगवान विष्णु, चकित रह गए लोग

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दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर में दिखा भगवान विष्णु का अद्भुत 'त्रिविक्रम' रूप, वायरल तस्वीर ने सोशल मीडिया पर मचाई धूम

दक्षिण भारत के एक अति प्राचीन मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु के अद्भुत 'त्रिविक्रम' रूप की तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। हजारों वर्ष पुरानी पत्थर की इस अलौकिक प्रतिमा को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित है। कला और भक्ति के इस अनूठे संगम में वामन अवतार की पूरी पौराणिक कथा जीवंत हो उठती है।

अहंकार पर भक्ति की विजय का प्रतीक! जानिए दक्षिण भारत की वायरल 'त्रिविक्रम' प्रतिमा का पौराणिक रहस्य

क्या है त्रिविक्रम रूप का पौराणिक महत्व?

सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए 24 अवतार लिए थे, जिनमें से पांचवां अवतार वामन अवतार (सतयुग) था:

  • राजा बलि का अहंकार और दंभ: दानवीर असुरराज बलि ने अपनी भक्ति और शक्ति से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे।

  • तीन पग भूमि का संकल्प: बलि द्वारा आयोजित विशाल यज्ञ में भगवान विष्णु एक नन्हे वामन (बौने) ब्राह्मण के रूप में पहुंचे। जब बलि ने उनसे इच्छा मांगने को कहा, तो वामन देव ने केवल तीन पग भूमि मांगी।

  • विराट रूप का प्रकटीकरण: जैसे ही बलि ने जल छोड़कर संकल्प लिया, वामन भगवान का आकार बढ़ने लगा और उन्होंने अपना अनंत 'त्रिविक्रम' रूप धारण कर लिया।

ब्रह्मांड को नापने वाले तीन पग:

  1. पहला पग: पूरी पृथ्वी लोक को नापा।

  2. दूसरा पग: संपूर्ण आकाश और स्वर्ग लोक को नापा।

  3. तीसरा पग: जब कोई स्थान शेष नहीं बचा, तो दानवीर बलि ने अपना मस्तक आगे कर दिया। भगवान ने तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया और उनकी दानवीरता से प्रसन्न होकर स्वयं उनके द्वारपाल बने।

पत्थर में तराशी गई हजारों साल पुरानी कलाकृति

दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु के तिरुकोइलूर स्थित तिरुविक्रम मंदिर और कांचीपुरम के प्राचीन मंदिरों) में भगवान के इस रूप की विशाल मूर्तियां स्थापित हैं। वायरल हो रही प्रतिमा में भगवान का एक पैर पृथ्वी पर स्थिर है, जबकि दूसरा पैर आकाश की ओर ऊपर उठकर पूरे ब्रह्मांड को नापता प्रतीत होता है।

  • इतिहास और वास्तुकला: विशेषज्ञों के अनुसार, 7वीं से 9वीं शताब्दी के बीच चोल और पल्लव राजवंशों द्वारा इन मंदिरों का निर्माण कराया गया था। बिना किसी आधुनिक तकनीक या मशीन के, कठोर पत्थरों को तराशकर इतनी बारीक और जीवंत आकृतियां उभारना आज के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए भी एक अबूझ पहेली है।

  • सजीव अभिव्यक्ति: प्रतिमा में भगवान के मुख की शांति, हाथों में धारण सुदर्शन चक्र और पैरों की मुद्रा में गति का संतुलन ऐसा है मानो वे अभी कदम बढ़ा देंगे।

अहंकार पर भक्ति की विजय का संदेश

यह प्राचीन धरोहर संदेश देती है कि अहंकार चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, प्रभु की लीला के आगे बौना साबित होता है। साथ ही, यह सनातन संस्कृति की उस समृद्ध परंपरा का प्रमाण है, जिसकी कथाएं केवल ग्रंथों तक सीमित न रहकर आज भी हमारे मंदिरों के पत्थरों में सुरक्षित हैं।

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