Crumbling Education System भैंसों के तबेले में विद्या का मंदिर: 50 मासूमों के सिर पर लटक रही मौत

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भैंसों के तबेले में विद्या का मंदिर — रतलाम के कासाखेड़ी से शिक्षा व्यवस्था की दर्दनाक तस्वीर

रतलाम : "शाला उन्नयन", "ज्ञानोदय" और "सीएम राइज" जैसी भारी-भरकम योजनाओं के दावों के बीच मध्यप्रदेश के रतलाम जिले से शिक्षा व्यवस्था की एक बेहद जर्जर और खौफनाक तस्वीर सामने आई है। ग्राम कासाखेड़ी स्थित शासकीय प्राथमिक विद्यालय में 50 मासूम बच्चे सुविधाओं के अभाव में नहीं, बल्कि सीधे तौर पर 'मौत के साये' में बैठकर भविष्य गढ़ने को मजबूर हैं।

रतलाम कासाखेड़ी के प्राइमरी स्कूल में टपकती छत और जंग लगे पंखे के नीचे पढ़ने को मजबूर 50 बच्चे

एक कमरा, 5 कक्षाएं और त्रिपाल की छत कासाखेड़ी के इस प्राथमिक विद्यालय की स्थिति किसी खंडहर से कम नहीं है। कायदे से 5 अलग-अलग कक्षाओं के लिए कम से कम 5 कमरों की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ पहली से पांचवीं तक के सभी 50 बच्चे महज एक ही कमरे में ठसाठस बैठने को मजबूर हैं।

  • जर्जर छत और लटकता खतरा: छत का प्लास्टर उखड़ चुका है और जंग लगा सरिया बाहर दिखाई दे रहा है। बारिश से बचने के लिए छत पर त्रिपाल बांधी गई है।

  • जानलेवा पंखा: बच्चों के ठीक सिर के ऊपर एक पुराना, जंग लगा भारी पंखा लटक रहा है, जो किसी भी वक्त बड़े हादसे का सबब बन सकता है।

  • शिक्षकों की कमी: पूरे स्कूल का दारोमदार सिर्फ 2 शिक्षकों पर है, जिनके लिए एक साथ 5 कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाना और संभालना व्यावहारिक रूप से असंभव साबित हो रहा है।

सूखा नल और ताले में बंद शौचालय स्कूल में मूलभूत सुविधाओं का पूरी तरह अभाव है। पीने का नल महीनों से सूखा पड़ा है, जिससे बच्चे प्यासे रहने या घर से पानी लाने पर मजबूर हैं। शौचालय की हालत इतनी बदहाल और गंदगी से भरी है कि बच्चियां स्कूल आने से कतराने लगी हैं। खेल का मैदान, कंप्यूटर और लाइब्रेरी जैसी चीजें तो इन बच्चों के लिए केवल काल्पनिक शब्द बनकर रह गई हैं।

कागजी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर स्थानीय ग्रामीणों और शिक्षकों द्वारा कई बार शिकायतें और आवेदन देने के बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। हाईवे से दूर ग्रामीण अंचलों में स्थित यह स्कूल विभागीय उपेक्षा का जीता-जागता उदाहरण है।

प्रशासन से सीधी मांग:

  1. जर्जर भवन का तत्काल निरीक्षण कर उसे डिस्मेंटल (ध्वस्त) घोषित किया जाए और बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।

  2. छात्र-शिक्षक अनुपात को दुरुस्त करने हेतु अतिरिक्त शिक्षकों की तैनाती हो।

  3. वर्षों से इस जानलेवा लापरवाही पर आंखें मूंदे बैठे जिम्मेदार शिक्षा अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

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